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सपा को लगा बड़ा झटका, पार्टी प्रवक्ता हुवा भाजपा मे शामिल

समाजवादी पार्टी जब 2012 में उत्तर प्रदेश में सत्ता में आई तो उसके पास टीवी डिबेट पर पार्टी को रिप्रजेंट करने के लिए चेहरों की कमी थी. ऐसे में पार्टी के युवा चेहरों में से एक गौरव भाटिया ने कम समय में नेशनल टेलीविज़न पर अपनी जगह बनाई. शिवपाल और अखिलेश के विवाद के बीच चुनाव से ऐन पहले गौरव ने सपा के सभी पदों से इस्तीफा दे दिया. अब गौरव बीजेपी में शामिल हो गए हैं. इसकी टाइमिंग ठीक वही है जब मुलायम सिंह यादव अखिलेश के खिलाफ खुलकर बोल रहे हैं. क्या ये चुनाव बाद सपा के दो हिस्सों में टूटने की शुरुआत है? या यादव कुनबे की लड़ाई के चलते गैर यादव नेताओं के पार्टी छोड़ने की. इन सारे सवालों के जवाब तलाशने के लिए सपा से भाजपाई हुए गौरव के राजनीतिक करियर को देखा जा सकता है!

गौरव के पिता वीरेंद्र भाटिया यूपी के महाअधिवक्ता रह चुके थे. वीरेंद्र भाटिया राज्य सभा से सपा के सांसद भी थे. ऐसे में गौरव का बीजेपी में जाना, दूसरी पीढ़ी के नेताओं का पार्टी से दूर जाना है. साथ ही ये एक पढ़े लिखे अच्छे वक्ता का सपा से दूर जाना है. जिसका व्यक्तित्व ‘नई सपा’ के मुफीद हो सकता था!

सुप्रीम कोर्ट में सरकार के वकील और विवाद

गौरव सुप्रीम कोर्ट में यूपी सरकार की पैरवी करते थे. मगर अपर महाअधिवक्ता के तौर पर उनकी नियुक्ति काफी विवादों में रही थी. लखनऊ यूनिवर्सिटी से लॉ की पढ़ाई करके आने वाले गौरव को काफी कम उमर में ही बड़ी ज़िम्मेदारी मिल गई थी. जिसका अंदरूनी तौर पर बड़ा विरोध हुआ था. मार्च 2016 में गौरव को इस पद से हटा दिया गया था. जिसकी वजह अखिलेश यादव से उनकी नाराज़गी बताई गई थी. गौरव की सुप्रीम कोर्ट बार असोसिएशन के अध्यक्ष दुष्यंत दवे से हुई खींचतान को भी इस निलंबन की एक वजह माना गया था!

शिवपाल-अखिलेश दोनों गुटों से करीबी और फिर दूरी

बताया जाता है कि पहले गौरव शिवपाल यादव के करीबी थे. जिसके चलते अखिलेश यादव उनसे नाराज़ थे. सपा सरकार के आखिरी साल में उन्होंने अखिलेश यादव से नज़दीकियां बढ़ा लीं थी. पार्टी की रणनीति तय करने वाले ‘जनेश्वर मिश्र ट्रस्ट’ में भी उनका आना जाना काफी बढ़ गया था. माना जाता है कि इसके चलते अखिलेश गुट के कुछ बड़े नेताओं ने उनके खिलाफ साजिश की. इसी वजह से फरवरी में चुनावों के वक्त गौरव ने पार्टी की सभी ज़िम्मेदारियों से इस्तीफा दे दिया!

बीजेपी वैसे भी वकीलों और प्रवक्ताओं की पार्टी है. अरुण जेटली और सुषमा स्वराज से लेकर रविशंकर प्रसाद तक सभी वकील हैं. ऐसे में गौरव भी जल्द टीवी पर बीजेपी की तरफ से दलीलें देते दिख सकते हैं. 1 अप्रैल को गौरव ने ट्वीट कर के अर्णव गोस्वामी को कहा भी था कि वो उनकी वापसी का इंतज़ार कर रहे हैं!

वैसे आपको बता दें आज से 4 महीने पहले गौरव ने प्रधानमंत्री और बीजेपी को राष्ट्रीय मुद्दों का राजनीतिक इस्तेमाल करने वाला बताया था. इसके साथ ही  नोटबंदी को  खराब एक्ज़िक्यूशन वाला फैसला और सरकार को इनसेंसटिव बताया था. इसके साथ ही भाजपा नेताओं के नोटबंदी के बारे में पहले से पता होने की बात भी कही थी. और तो और ये भी कहा था कि भाजपा के पास यूपी में अच्छे नेताओं की कमी है. इसीलिए वो दूसरी पार्टी के नेताओं को अपने यहां फ्री में एंट्री दे रही है!

सपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती खुद को बचाए रखने की है. मुलायम सिंह यादव अब खुल कर अखिलेश यादव के विरोध में आ चुके हैं. ‘काम’ के टें बोल जाने से अखिलेश यादव के पीछे खड़े नेता सदमे जैसी स्थिति में हैं. ऐसे में एक दूसरी पीढ़ी के सपा नेता का भाजपा में जाना सपा की समस्या बढ़ाएगा. इस करारी हार के बाद यादव परिवार की कलह इतनी बढ़ चुकी है कि दोनों पक्षों में मेल मिलाप संभव नहीं है. ऊपर से एक सवाल और है कि सपा में अगर दोनों गुट एक हो जाए तो हार की ज़िम्मेदारी किस पर डाली जाएगी? दूसरी तरफ कार्यकर्ताओं के लिए दुविधा है कि किस गुट को समाजवादी पार्टी समझें, शिवपाल और मुलायम सिंह के गुट को. या अखिलेश को.कुल मिलाकर पार्टी सबसे बुरे दौर से गुज़र रही है. अखिलेश यादव अभी तक अपनी गुड बॉय की इमेज बचाए हुए हैं. मगर सियासत में सत्ता का मुलम्मा सबसे बड़ी चीज़ है!

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