एक समय ऐसा था जब आडवाणी और मुरली मनोहर की एक आवाज के आगे पूरी पार्टी खड़ी होती थी, पर अब….?

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एक समय ऐसा था जब आडवाणी की एक आवाज के आगे पूरी पार्टी खड़ी होती थी. आज सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी से पार्टी का कोई भी नेता मिलने नहीं गया.

बीजेपी के वयोवृद्ध और राम जन्मभूमि आंदोलन की अगुवाई करने वाले नेता आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी को अयोध्या मामले में सुप्रीम कोर्ट का आदेश आने के बाद पार्टी ने उन्हें अपने हाल पर छोड़ दिया है. सुप्रीम कोर्ट का अयोध्या पर फैसला आने के बाद एल.के. आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी से पार्टी का कोई भी नेता मिलने नहीं गया. पूरा दिन इन दोनों नेताओं के घर पार्टी की ओर से कोई भी सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर बात करने नहीं गया. दोनों नेता अपने अपने स्तर पर इस केस का मूल्यांकन करने में लगे थे. मगर एक समय पार्टी में ही एक दूसरे के प्रतिद्वंदी रहे मुरली मनोहर जोशी आखिरकार खुद चलकर आडवाणी के घर गए और सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर चर्चा की. इसके अलावा बीजेपी का कोई भी नेता दोनों से मिलने नहीं आया.

दोनों ही नेताओं के पास पार्टी में कोई पद नहीं है. दोनों केवल लोकसभा के सांसद हैं. इसलिए किसी भी विपक्षी पार्टी ने इस्तीफा भी नहीं मांगा. लेकिन तीसरी बड़ी नेता उमा भारती केंद्रीय मंत्री हैं. स्वभाविक तौर से विपक्ष ने उमा भारती से इस्तीफे की मांग जरुर की. लेकिन सरकार और पार्टी दोनों ने ही उमा भारती के बचाव में आने में देर नहीं लगाई और कहा कि उनको इस्तीफा देने की कोई जरुरत नहीं है.

लेकिन अब आडवाणी और जोशी के बारे में पार्टी को इतनी चिंता नहीं रही. उनके घर मिलने जाना तो दूर उनके बारे में पार्टी में कोई बात भी नहीं की, केवल उमा भारती से पूछे जाने पर उमा भारती ने उनका बचाव जरूर किया और कहा कि वह पार्टी के बड़े नेता हैं, पार्टी खड़ी की है और इस आंदोलन को अगुवाई करने वाले दोनों बड़े नेता हमारे सम्मानीय हैं, उनको उनके हाल पर छोड़ने का कोई सवाल नहीं है. बीजेपी नेता विनय कटियार जरूर इस मामले में सीबीआई की रणनीति को संदिग्‍ध मान रहे हैं और इशारा कर रहे हैं कि चूंकि यह एजेंसी सरकार के अधीन होती है, इसलिए यह एक बड़ी साजिश भी हो सकती है.

2014 के लोकसभा चुनाव के बाद आडवाणी और जोशी दोनों ही पार्टी में पहले से अलग-थलग हैं. वृद्ध और सीनियर होने के कारण पार्टी उनका सम्मान जरूर करती है. लेकिन उनसे ज्यादातर मामले में अमुमन मंत्रणा नहीं करती. कुछ सलाह नहीं ली जाती. इस बार भी सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी यही हुआ कि कोई भी पार्टी का नेता इन दोनों नेताओं से मिलने नहीं गया. जबकि एक समय ऐसा था जब आडवाणी की एक आवाज के आगे पूरी पार्टी खड़ी होती थी. खास तौर से यह कहा जाता है कि राम मंदिर आंदोलन के कारण भी बीजेपी पहली बार सत्ता में लौटे थे और आडवाणी ने ही पार्टी को खड़ा किया था. मगर अब हालात बदल चुके हैं. बीजेपी बदल चुकी है.

राजनीतिक जानकार यह भी बताते हैं कि इसके  पीछे एक वजह यह भी हो सकती है कि पार्टी मंदिर मुद्दे को अभी उतना तूल नहीं देना चाहती, उतनी हवा नहीं देना चाहती. इसलिए उमा भारती को भी अयोध्या जाने से रोका गया. क्योंकि जो मोदी और योगी विकास के एजेंडे पर आगे बढ़ रहे हैं और 2019 के लोकसभा चुनाव को देखते हुए पूरी रणनीति बनाए हुए हैं. ऐसे में अयोध्या मुद्दे पर आगे बढ़ना सरकार के एजेंडे को डायलूट कर सकता था. इसी वजह से पार्टी इस मुद्दे पर शांत ही बैठी रही. क्योंकि अगर आडवाणी और जोशी से पार्टी के नेता मिलने जाते हैं, तो कहीं ना कहीं एक मैसेज यह भी जा सकता था कि अयोध्या मुद्दे को पार्टी जिंदा करना चाहती है. इस मुद्दे पर आडवाणी जोशी के साथ का मतलब उन लोगों का कद भी बढ़ सकता था क्योंकि राम मंदिर आंदोलन में मेन भूमिका आडवाणी जोशी की रही है. कहीं दोबारा से उनका अहमियत ना बढ़ जाए इसलिए पार्टी ने अपने आप को पीछे हटा के रखा.

दूसरा अभी राम मंदिर के मुद्दे को बीजेपी ज्यादा तूल नहीं देना चाहती, बेशक  उनके कुछ नेता राम मंदिर का राग अलाप रहे हों. भव्य राम मंदिर बनाने की बात कर रहे हों. लेकिन शीर्ष नेतृत्व की ओर से इस बात का मैसेज ना चला जाए, यह रणनीति का ही महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है.

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