2017 विधानसभा चुनाव प्रधानमंत्री द्वारा अपने ही पद की गरिमा गिराये जाने के लिए भी याद किया जाएगा !

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उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के दौरान कई मौके ऐसे आए जब केंद्रीय मंत्रियों और भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने बार-बार यह दोहराया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर विपक्ष बहुत तीखे हमले बोल रहा है. यह भी कहा गया कि विपक्ष प्रधानमंत्री की संस्था का सम्मान नहीं कह रहा. केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह, गृह मंत्रालय में ही राज्य मंत्री किरण रिजिजू और केंद्रीय शहरी विकास मंत्री वेंकैया नायडू समेत कई भाजपा नेताओं ने समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस की ओर से नरेंद्र मोदी पर हो रहे हमलों को प्रधानमंत्री की संस्था का अपमान करने वाला बताया. एक साक्षात्कार में राजनाथ सिंह का कहना था, ‘हर किसी को ध्यान रखना चाहिए कि वह किन शब्दों का इस्तेमाल कर रहा है. किसी को यह बात नहीं भूलनी चाहिए कि प्रधानमंत्री स्वयं में एक संस्था है और संस्था की गरिमा का सम्मान होना चाहिए. संस्थाओं की गरिमा गिराने और व्यवस्था को भंग करने का कोई प्रयास नहीं होना चाहिए क्योंकि देश को इसकी कीमत चुकानी पड़ती है!

यह बात सही है कि उत्तर प्रदेश के चुनावों में नरेंद्र मोदी पर तीखे हमले हुए. मायावती, अखिलेश यादव और राहुल गांधी ने उन पर चुनाव अभियान के दौरान तरह-तरह के आरोप लगाए. लेकिन इसके साथ-साथ इस बात पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि उत्तर प्रदेश के चुनावी अभियान में प्रधानमंत्री ने भी किस स्तर पर जाकर अपने विरोधियों पर हमले बोले. कई प्रधानमंत्रियों का कार्यकाल देखने वाले लोग यह कह रहे हैं कि उन्होंने किसी प्रधानमंत्री को इतने निचले स्तर पर जाकर अपने राजनीतिक प्रतिद्वंदियों पर हमले करते हुए नहीं देखा था!

कई प्रधानमंत्रियों का कार्यकाल देखने वाले लोग यह कह रहे हैं कि उन्होंने किसी प्रधानमंत्री को इतने निचले स्तर पर जाकर अपने राजनीतिक प्रतिद्वंदियों पर हमले करते हुए नहीं देखा था

इसे प्रधानमंत्री मोदी के कुछ बयानों के जरिए समझने की कोशिश करते हैं. चुनाव प्रचार के आखिरी दिन नरेंद्र मोदी अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी में चुनाव प्रचार कर रहे थे. इस दिन उन्होंने एक चुनावी सभा को संबोधित करते हुए कहा, ‘नोटबंदी के बाद बुआ जी को भी तकलीफ, बुआ जी के भतीजे को भी तकलीफ और भतीजे के यार को भी तकलीफ होने लगी. अखिलेश जी हिम्मत हो तो अपने नए यार को जौनपुर की सड़कों पर साइकिल पर बैठाकर दिखाओ. कोई अच्छा काम होता है तो लोग गायत्री मंत्र का जाप करते हैं. लेकिन आखिलेश और उनके यार ने रेप का आरोप झेल रहे गायत्री का प्रचार करके चुनाव का श्रीगणेश किया!

यह भारत के प्रधानमंत्री का बयान है. गांवों में अगर जाएं और लोगों से बात करें तो पता चलता है कि यह बयान जिस पर हमला हो, वह इसका जवाब न दे तो चर्चा होने लगती है कि हमला करने वाले से डरकर वह ऐसा नहीं कर रहा. जाहिर है कि इस तरह का बयान भी उसी स्तर पर जाकर दिया जाएगा जिस स्तर पर ये बयान दिए जाते हैं!

जिस बयान का जिक्र यहां किया गया है, वह प्रधानमंत्री का इस तरह का कोई इकलौता बयान नहीं है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मेरठ में एक चुनावी सभा में प्रधानमंत्री ने घोटाले के अंग्रेजी प्रतिरूप स्कैम के लिए नया अर्थ गढ़ा. स्कैम शब्द चार अक्षरों से बनता है. प्रधानमंत्री ने इस सभा में कहा कि एस से समाजवादी, सी से कांग्रेस, ए से अखिलेश और एम से मायावती. फतेहपुर की चुनावी रैली में पीएम ने कहा, ‘रमजान में बिजली आती है तो दिवाली में भी आनी चाहिए.’ वे यहीं नहीं रुके. आगे उन्होंने कहा, ‘यदि कब्रिस्तान है तो श्मशान भी होना चाहिए. ईद और होली दोनों के मौके पर बिजली आनी चाहिए. किसी भी सूरत में भेदभाव नहीं होना चाहिए.’ चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने अखिलेश यादव, मायावती और राहुल गांधी पर निजी हमले करते हुए ऐसे कई बयान दिए!

एक और उदाहरण लें. मिर्जापुर में एक चुनावी सभा में वहां की समस्याओं का उल्लेख करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कहना था, ‘13 साल पहले यहां पुल निर्माण का आधारशिला रखे थे, लेकिन अभी तक नहीं बना, ये काम नहीं कारनामे बोल रहे हैं. जो अपने पिता की बातों को पूरा नहीं करता हो, वो जनता का काम क्या करेंगे? अखिलेश जी का काम बोलता है या मिर्जापुर का पत्थर बोलता है.’ इसी सभा में मायावती पर हमला करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि बहन जी मिर्जापुर के पत्थरों में आज भी खड़ी हैं. जालौन की एक सभा में बसपा की नई फुल फाॅर्म उन्होंने बहनजी संपत्ति पार्टी बताई. एक दूसरी सभा में प्रधानमंत्री ने मायावती को दौलत की बेटी कहा!

इस तरह के बयानों को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आलोचना दिल्ली और बिहार विधानसभा चुनावों के दौरान भी हुई थी

विज्ञान में न्यूटन का एक नियम है जो बताता है कि हर क्रिया की प्रतिक्रिया होती है. न्यूटन का यही नियम कम से कम उत्तर प्रदेश चुनावों के दौरान पूरी तरह लागू दिखा. प्रधानमंत्री के हमलों के बाद उन पर जब राहुल गांधी, अखिलेश यादव और मायावती ने जवाबी हमले किए तो अचानक केंद्रीय मंत्रियों और भाजपा नेताओं को प्रधानमंत्री की संस्था और इसकी गरिमा की याद आने लगी!

धुर वामपंथी लेकिन 2014 के लोकसभा चुनावों में नरेंद्र मोदी की कामयाबी पर खुश होने वाले और देश की सियासी स्थितियों पर पैनी नजर रखने वाले एक बुजुर्ग प्रधानमंत्री के बयानों का स्तर गिरने पर दुख जताते हैं. उनका कहना है कि प्रधानमंत्री के भाषण का स्तर कई बार नगर निगम चुनावों के प्रत्याशियों से भी नीचे के स्तर पहुंच गया. वे कहते हैं, ‘मेरी उम्र 80 साल से अधिक हुई लेकिन मुझे याद नहीं कि कभी कोई प्रधानमंत्री इतने निचले स्तर पर जाकर अपने विरोधियों पर हमले करता हो!

इस तरह के बयानों को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आलोचना दिल्ली और बिहार विधानसभा चुनावों के दौरान भी हुई थी. दिल्ली में उन्होंने आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल को नक्सली करार दिया था तो बिहार में वे लालू प्रसाद और नीतीश कुमार को तरह-तरह के विशेषणों से नवाज रहे थे. लेकिन दोनों जगह भाजपा को मुंह की खानी पड़ी. कई राजनीतिक जानकार भाजपा की करारी हार की कई वजहों में एक वजह यह भी मानते हैं कि प्रधानमंत्री ने इन चुनावों में अनावश्यक बयान दिए. लेकिन इन्हीं जानकारों के मुताबिक भाजपा की आंतरिक राजनीति में आज नरेंद्र मोदी की यह हैसियत है कि कोई उन्हें यह नहीं कह सकता कि आपको क्या बोलना चाहिए और क्या नहीं. यही वजह है कि उत्तर प्रदेश में भी वे इस तरह के बयान देने के मामले में कुछ कदम आगे ही बढ़े!

अब उत्तर प्रदेश की जनता इन बयानों से प्रभावित होकर भाजपा को देश के सबसे बड़े राज्य में राज करने का मौका देती है या उसकी गति दिल्ली और बिहार जैसा ही करती है, यह जानने के लिए तो इस सप्ताहांत तक इंतजार करना होगा. लेकिन यह तो तय है कि इस बार के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों को खुद प्रधानमंत्री द्वारा प्रधानमंत्री पद की गरिमा को कम करने के लिए भी याद किया जाएगा!

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