चंद्रशेखर जयंती Special : मुझे कैद करो या मेरी जुबां को बंद करो, मेरे सवाल को बेड़ी कभी पहना नहीं सकते !

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मुझे कैद करो या मेरी जुबां को बंद करो,मेरे सवाल को बेड़ी कभी पहना नहीं सकते.

ये शेर 1977 में इमरजेंसी के दौरान 19 महीने जेल में रहने के बाद चंद्रशेखर बाहर निकलने पर उनकी जुबान से निकला था. आज जब वो नहीं हैं, तो उनके इस इरादे और विचार की प्रासंगिकता कहीं ज्यादा दिख रही है. आज सवाल यही है कि क्या हम बुनियादी सवालों से टकराएंगे या फिर ये जज्बाती ज्वार हमें बहा ले जाएगा? सवाल ये भी है कि चंद्रशेखर आज होते तो क्या करते? चंद्रशेखर जिंदा होते तो इस 17 अप्रैल को 90 साल के होते.

सत्ता का चरित्र ऐसा होता है कि वो असहमति को अक्सर विरोध मान लेती है. हर आलोचना में उसे अपनी अहमियत पर प्रश्नवाचक चिह्न लगता दिखता है. हर भूख में उसे साजिश नजर आती है. हर अनपढ़ के चेहरे पर उसे भविष्य का आक्रोश लिखा दिखता है. हर नंगे में उसे अपनी नाकामियों का परदा उठता दिखता है. इसीलिए इंसान की भूख-प्यास का सवाल सत्ता के शोर में अपनी आवाज खो देती है. इसीलिए बराबरी का सवाल नाइंसाफी की कब्र पर दम तोड़ देता है. इसीलिए एक देश के रूप में हमारी पहचान कुछ लोगों के महानायकत्व में विलीन हो जाती है. इसी जड़ता पर चंद्रशेखर सवाल उठाते थे.

चंद्रशेखर की जिंदगी का एक हिस्सा मिशन और महत्वाकांक्षा के भंवर में फंसा रहा. तो एक हिस्सा उन सवालों के लिए आरक्षित था, जिससे सत्ता असहज महसूस करती थी और अपने पराए हो जाते थे. जब संवेदना भी बाजार में बिकने लगे तो उस संवेदना को विवेक के साथ जोड़ने वाला शख्स अक्सर हाशिए पर छोड़ दिया जाता है. चंद्रशेखर एक कालखंड में इसी त्रासदी से लड़ते रहे. वो लड़ते रहे सत्ता की उस अधिनायकवादी छवि से, जिसने 40 साल की उम्र में उन्हें बड़े बड़े उद्योगपतियों और राजे-रजवाड़ों की आंखों का किरकिरी बना दिया. जिसने 45 साल की उम्र में उन्हें अपने समय में भारत का पर्यायवाची मान ली गईं इंदिरा गांधी का कोप-भाजक बना दिया. और इसी कारण एक अंधेरी रात जब लोकतंत्र पर तानाशाही का ग्रहण लगा तो उनको सलाखों के पीछे धकेल दिया गया.

तानाशाही कोई सत्ता का डंडा भर नहीं होती. वो एक मानसिकता भी होती है, जो अक्सर उन्माद के गर्भ से निकलती है. वो मानसिकता कई बार क्रांति के पेट से भी निकलती है. इसी मानसिकता के खिलाफ चंद्रशेखर उस इंदिरा गांधी से भी लड़े जो उनकी पार्टी की सर्वोच्च नेता थीं. और इसी मानसिकता की एक आहट उन्होंने तब पहचान ली थी, जब जयप्रकाश नारायण संपूर्ण क्रांति का आंदोलन चला रहे थे. चंद्रशेखर ने उन्हें आगाह किया था कि आप जिनमें देश का भविष्य देखते हैं, जाने-अनजाने वही नेता आने वाले वक्त में अपनी-अपनी जातियों के नेता बनकर रह जाएंगे.

40 साल बाद हम कमोबेश उसी स्थिति में खड़े हैं. जेपी के आंदोलन से निकली एक जमात उस राष्ट्रवाद का प्रणेता बन गई है, जो कुछ बहुसंख्यकों का उन्माद भर है. इनके लिए राष्ट्रवाद की गंगा संप्रदाय की गंगोत्री से निकलती है. दूसरी तरफ वो जमात है, जिसने जाति की सीढ़ी बनाकर सत्ता हासिल कर ली. लेकिन जब भी धर्म और जाति में जंग होती है, धर्म जीतता है, जाति हारती है. क्योंकि जाति से ज्यादा उन्माद धर्म में होता है.

तो क्या इस धर्म और जाति से बाहर निकलकर देश को बनाने और संवारने का कोई दूसरा रास्ता नहीं है? ये रास्ता भी चंद्रशेखर दिखाते थे. 1983 में उन्होंने कन्याकुमारी से दिल्ली तक की पदयात्रा की थी. गांधी की तरह अपने पैरों से हिंदुस्तान को नापकर किसी ने मानस को परखा तो वे चंद्रशेखर थे. उस पदयात्री की राजनीति में ना धर्म था, ना जाति थी. बस पांच बुनियादी मुद्दे थे- सबको पीने का पानी, हर व्यक्ति को कुपोषण से मुक्ति, हर बच्चे को पढ़ाई का हक, हर इंसान को स्वास्थ्य का अधिकार और मनुष्य मात्र की गरिमा की रक्षा, जिसे सामाजिक समरसता का नाम दिया.

लेकिन बुनियादी सवालों का सिक्का शायद वोट के बाजार में नहीं चलता. 1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए लोकसभा चुनाव में मुद्दा ये नहीं था कि भूखे पेटों को खाना मिलेगा या नहीं. मुद्दा इंदिरा गांधी की हत्या और उनकी वतनपरस्ती का शोर बन गया. बुनियादी सवालों से लड़ने वाले नायक को उसकी एक राय पर खलनायक बना दिया गया कि सरकार को भिंडरावाला से लड़ने के लिए अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में सेना नहीं भेजना चाहिए था. चंद्रशेखर ने दूसरा सवाल ये उठाया कि भिंडरावाला को भिंडरावाला किसने बनाया? दरअसल पंजाब में आतंकवाद हिंदू बनाम सिख में बदल गया था. क्या आज हिंदू और मुसलमान की कलह डराने वाली नहीं है?

हिंदू-मुस्लिम से याद आया कि चंद्रशेखर ने अयोध्या में राम मंदिर-बाबरी मस्जिद के विवाद को सुलझाने का एक ईमानदार प्रयास किया था. वो प्रयास ना धार्मिक उन्माद पर था, ना अदालत के फैसले पर. वो प्रयास दोनों समुदायों के नेताओं को एक टेबल पर बैठाकर बातचीत से रास्ता बनाने का था. लेकिन चंद्रशेखर की सरकार गिर गई और डेढ़ साल में अयोध्या विवाद की परिणति बाबरी मस्जिद के ध्वंस के रूप में सामने आई. आज 25 साल बाद मंदिर-मस्जिद विवाद का सारा उन्माद बातचीत की चौखट पर हांफ रहा है.

ऐसा नहीं है कि माहौल में जहर सिर्फ बहुसंख्यक तबके की राजनीति करने वालों ने घोला, दूसरे भी अपनी आहूति डालते रहे. जब जुम्मे की नमाज के लिए मुसलमानों को शुक्रवार को छुट्टी देने का प्रस्ताव उठा तो चंद्रशेखर ने संसद में चेताया था कि इसका परिणाम बुरा होगा क्योंकि जब बजरंग दल वाले मंगलवार को हनुमान चालीसा पढ़ने के लिए छुट्टी मांगेंगे तो सरकार क्या करेगी. सत्ता पक्ष और विपक्ष की खाइयों को पाटने में चंद्रशेखर का इतना वक्त जाया हुआ, जो रचनात्मक कार्य का कारक बन सकता था.

कारण चाहे जो भी हो लेकिन समाज के कुछ तबकों में आज डर है. वो डर निजी हमले का हो सकता है और दंगे का भी. दंगे तभी होते हैं, जब सरकार उसे रोकने की इच्छाशक्ति नहीं दिखाती, भले ही उसका कारण जो भी हो. चंद्रशेखर तो कांग्रेस की बैसाखी पर चलने वाली सरकार के प्रधानमंत्री थे, वो भी कामचलाऊ जब पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या हो गई. ऐसे नाजुक मौकों पर दंगों का सांप सबसे पहले फन उठाता है. लेकिन चंद्रशेखर ने सेना से कहा कि कुछ भी हो, जजबाती आक्रोश में इंसान के हाथों इंसान का खून नहीं बहना चाहिए. सेना के अधिकारियों ने कहा कि हमें जिलों में सिविल अथॉरिटी काम नहीं करने देती. चंद्रशेखर ने कहा कि मैं देश का सबसे बड़ा सिविल अथॉरिटी हूं और मैं आप लोगों को पूरा सहयोग देता हूं.

चंद्रशेखर का ना होना इसीलिए आज अखरता है कि सड़क से संसद तक वो बेबाकी खत्म हो रही है, जिसमें तर्क भी हो, संयम भी और संवेदना भी. चंद्रशेखर के व्यक्तित्व के यही गुण उन्हें अपने समकालीन नेताओं से अलग करते थे और बीतते वक्त के साथ ज्यादा महान भी.

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